Rigveda Sayan Bhashya Bhumika

Rigveda Sayan Bhashya Bhumika

Shrinarayan Pathak , Chittnarayan Pathak · Chaukhambha Classica

Hindi · Paperback · Edition: First

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इस ब्रह्माण्ड के तत्तद् अनन्त योनियों में निवास करने वाले असङ्ख्य जीवों में मनुष्य योनि के जीव पुरुषाऽर्थप्रापक साधनों में अधिकाऽधिक सम्पन्न होने से श्रेष्ठ माने जाते हैं। धर्माऽर्थ-काम-मोक्ष स्वरूप उन पुरुषाऽर्थों का साक्षात् साधन होने से धर्मश्रेष्ठ माने जाते हैं, धर्मों के प्रकाशक होने के कारण धर्मों के सार वेद माने गये हैं, उन वेदों में भी सार्वभौमिकता का केन्द्र माने जाने के कारण चतुर्विध वेदों में प्रधान ऋग्वेद को ही वैदिक विद्वानों ने अङ्गीकार किया है। ऋग्वेद का प्राधान्य अन्य वेदों की अपेक्षा सिद्ध होता है कि इसमें पुरुषाऽर्थ-साधक धर्म के गूढाऽर्थ रहस्य का जिस प्रकार प्रतिपादन स्पष्टता से हुआ है वैसा अन्यत्र सर्वथा दुर्लभ है। इस प्रकार की महत्ता की अभिव्यक्ति का अहम् कारण ऋग्वेद के भाष्य को ही माना जाता है, किन्तु महासागर के समान दुरवगाह उस भाष्य के सार अंश का संग्रह आचार्य सायण ने सागर में गागर जल के समान तथा दधि में नवनीत के समान अपनी सारग्राही अलौकिक प्रतिभा से ऋग्वेद भाष्य भूमिका के रूप में प्रस्तुत किया है। किन्तु साधारण जिज्ञासुओं को भी उसका प्रचुर लाभ मिल सके इस अभिप्राय से यहाँ पर संस्कृत व्याख्या साथ-साथ हिन्दी व्याख्या को भी इस भाष्य भूमिका में समायोजित किया गया है, जिसके कारण प्रकृत ग्रन्थ के अर्थ का शरीर अत्यन्त स्पष्ट हो गया है।

ISBN-139789391730048
AuthorShrinarayan Pathak , Chittnarayan Pathak
PublisherChaukhambha Classica
LanguageHindi
BindingPaperback
EditionFirst
Pages480
Year2024

Category: Religion & Spirituality

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