Vairagi वैरागी: नारी अन्तर्मन पर आधारित आध्यात्मिक कथा प्रसंग
Pt. Arun Kumar Sharma · Astha Prakashan
वैरागी यानि जो व्यक्ति इतना समर्थ है कि सुख-दुख विषय वस्तुओं के बीच में रहता हुआ भी अप्रभावित बना रहे। वही सच्चा वैरागी है। वैराग्य स्वतः पैदा होने का भाव है और भाव तभी पैदा होगा जब जीवन में अप्रत्याशित घटना न घट जाये। कुछ लोग उसमें डूबकर जीवन को व्यर्थ कर देते हैं और कुछ लोग हो जाते हैं वैराग्य को उपलब्ध। वैरागी पुस्तक में उन लोगों की कथा है जिनके जीवन में आकस्मिक घटना घटी, जिसका वर्णन पुस्तक में है। वह लोग संसार में वापस न जाकर अध्यात्म मार्ग की ओर अग्रसर हो गये। अध्यात्म मार्ग स्वतः की ऊर्जा है और स्वयं का दीप है। यह स्वयं प्रकाशित होता है। कोई अन्य इसे जला नहीं सकता। तथागत का बुद्धत्व स्वयं प्रज्जवलित हुआ। वह स्वयं के मार्ग पर चले अकेले नितान्त अकेले। गुरु या मार्गदर्शक बस राह बतला सकता है स्वयं नहीं चलता। चलना तो स्वयं को पड़ता है। बहुत से जिज्ञासु लोगों का फोन आता है। कुछ मिलने भी चले आते हैं। उन्हे साधना करनी है, संन्यासी बनना है। मैं उन्हे क्या जवाब दूं, बस चुप हो जाता हूं। यह मार्ग स्वयं का मार्ग है स्वयं चलना पड़ता है। इस मार्ग में न कोई साथी है न ही गुरु। स्वयं को जानना है तो बुद्ध का कथन है स्वयं अपना दीप बनो...। यानि स्वयं चलो, स्वयं रास्ता बनाओ। अगर आपके अन्दर साधना का संस्कार है, किसी जन्म में आपकी साधना अधूरी है तो वह पूर्ण अवश्य होगी। आप चलें... किसी से जुड़े नहीं। किसी अन्य मार्ग को अपनाएं नहीं। अगर आपके अन्दर श्रद्धा है, विश्वास और तपस्या करने की शक्ति है तब आगे बढ़ें। जब आप आगे बढ़ेंगे तब ब्रम्हाण्डीय चेतना किसी न किसी रूप में आपकी सहायता अवश्य करेगी। यह मेरा विश्वास और स्वयं का अनुभव है।
Buy NowIndia's trusted online book store