Ath Shree Gamchha Mahatmay
Moolchandra Gautam · Kautilya Books
व्यंग्य तो वैसे भी क्षत्रिय विधा है जो दीन हीन हो ही नहीं सकती. व्यापा-रियों ने इसे भी सरकार की चापलूसी में लगा दिया है. पता ही नहीं चलता कि व्यंग्यकार जूते चाट रहा है या जूते मार रहा है. सत्ता जब ऐसी कटु सत्यवाचक विधा को भी अपनी जरखरीद दासी बना ले तो फिर कहने को बचता ही क्या है? एक वक्त था जब सत्ताधीश कार्टूनों के आप्तवाक्यों के पीछे जनमत के कूटार्थ बाँचते थे. अब तो वे दम ही तोड़ चुके हैं. सरकारी ठप्पा लगते ही लेखक की हर रचना विज्ञापन और क्रांति विरोधी हो जाती है. तब क्या रचना के लिये जेल जाये बिना क्रांति सम्भव ही नहीं? पुरस्कार वापसी गैंग इसीलिए अब प्रतिक्रान्तिकारी होने का लाभ नहीं उठा सकता. यानी राष्ट्रवादी होने की सारी सम्भावनाएँ हमेशा के लिये समाप्त. अब सरकार बदलने पर ही शहर की सम्भावना सम्भव है. गाँव का जीवन यों भी कष्टकारी है. अतीत में चिरगाँव से राज्यसभा जाना सम्भव था लेकिन अब वहाँ सिर्फ मनरेगा की मजदूरी मिल सकती है. उसमें भी पत्ती तय है.
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