Alochana Ka Maun

Alochana Ka Maun

Devendra Arya · Kautilya Books

Hindi · Paperback · Edition: N/A

₹399

कविता बहाव माँगती है, आलोचना ठहराव। बहते हुए को थोड़ा ठहर कर निरखना, परखना, मूल्यांकित करना ही आलोचना कर्म है। रचना के ठहर जाने (प्रकाशन) के बाद भी उसमें पाठकीय बहाव की सम्भावना बनी रहती है। रघुवीर सहाय ने एक जगह इस ओर संकेत किया है। इन्ही अर्थों में 'पाठ' रचना को नया जीवन प्रदान करता है। नये पाठ और नई दृष्टि के अभाव में आलोचना का ठहर जाना एक तरह का मूल्यगत ठहराव है। आलोचना के इस ठहराव-यानी ठहर कर न देखे जाने और कभी-कभी रचना के आगे ठक् रह जाने से ही 'आलोचना का मौन' उभरता है। रचना की तत्कालीन चौंध, उसकी ख्याति या उसके पक्ष में लिखी गई आलोचनाओं का आतंक, वैचारिक-सांगठनिक आग्रह तथा व्यक्तिगत रिश्ते, आलोचना के इस मौन के निमित्त हो सकते हैं।

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