Chaploosi Ka Anushasan
Ajay Anuragi · Panchsheel Prakashan
“चापलूसी का अनुशासन” एक ऐसा व्यंग्य संग्रह है जो व्यक्ति के भीतर छिपी चिपकी स्वार्थ और चापलूसी की प्रवृत्ति के छिलकों को उतारकर उजागर करने की कोशिश करता है। व्यक्ति अधिकारों के प्रति सजगता दिखा रहा है, किन्तु कर्त्तव्यों के प्रति उदासीन, ऐसा क्यों? ये व्यंग्य व्यक्ति के उन मनोवैज्ञानिक पक्षों का भी
“चापलूसी का अनुशासन” एक ऐसा व्यंग्य संग्रह है जो व्यक्ति के भीतर छिपी चिपकी स्वार्थ और चापलूसी की प्रवृत्ति के छिलकों को उतारकर उजागर करने की कोशिश करता है। व्यक्ति अधिकारों के प्रति सजगता दिखा रहा है, किन्तु कर्त्तव्यों के प्रति उदासीन, ऐसा क्यों? ये व्यंग्य व्यक्ति के उन मनोवैज्ञानिक पक्षों का भी खुलासा करते हैं जिनके कारण वह परम् अनुशासन की पगडंडी पर चलता हुआ प्रतीत होता है। यद्यपि यह अनुशासन छलावे का मकड़जाल है तथापि दिखावे के रेशमी, सतरंगी धागों से सजीला दिखता है। मनुष्य की वे प्रवृत्तियाँ जो उसे मानवीयता से काटकर दूर ले जाती हैं, इस संग्रह में व्यंग्यकार की लेखनी के निकष पर कसी गयी हैं। अजय अनुरागी के व्यंग्यों की विशेषता है कि ये मामूली घटना से प्रारम्भ होकर यथार्थ स्थितियों पर पहुँचकर महीन मार करते हैं। जन पक्षधरता को व्यक्त करने वाले इन व्यंग्यों में आम आदमी की पीड़ा एवं विडम्बना का चित्रण हुआ है। निश्चय ही ये व्यंग्य पाठकीय संवेदना का हिस्सा बनने में समर्थ हैं।
| ISBN-13 | 9788170564058 |
|---|---|
| Author | Ajay Anuragi |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2007 |
| Pages | 152 |
| Year | 2007 |
| Subject | Literature & Fiction |
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