Begam Hazrat Mahal
Surendra Kant · Panchsheel Prakashan
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान वीरांगना बेग़म हजरत महल के देशप्रेम, अदम्य साहस और अद्भुत सैन्य संगठन शक्ति की गाथा। यह ऐतिहासिक उपन्यास 1857 के संग्राम में उनके योगदान और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उनके संघर्ष को जीवंत करता है।
बेग़म हजरत महल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का ऐसा अद्भुत तथा विरल पात्र है जिसके व्यक्तित्व में देशप्रेम के साथ अदम्य साहस, अनुपम पराक्रम और शौर्य, अद्भुत सैन्य संगठन शक्ति एवं राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रति विलक्षण कामना का गम्भीर समुच्चय है। यह महान वीरांगना अवध की बेग़म थी जिसने 1857 में आज़ादी पाने का शंखनाद किया तथा अवध, बिहार, रूहेलखण्ड और मध्य भारत की जनता को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ने की प्रेरणा दी। अवध का अन्तिम शासक वाजिद अलीशाह, असीम स्फूर्ति, साहस और शौर्य भरे व्यक्तित्व के बावजूद, विलासपूर्ण स्वभाव के कारण अकर्मण्य शासक सिद्ध हुआ। अंग्रेजों ने उसे पदच्युत कर कलकत्ते में नजरबंद कर दिया था। अवध के अंग्रेजों के राज्य में विलय से बेग़म हजरत महल की आत्मा विद्रोह कर उठी और उसने मातृभूमि को स्वतंत्र करने का संकल्प किया। बेग़म ने अनेक देशी राजाओं, नवाबों एवं नेताओं को संगठित कर ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध संग्राम छेड़ दिया। बेग़म के इस आह्वान का बहुत व्यापक प्रभाव हुआ। इस संघर्ष में बेग़म हजरत महल और उसके साथी पराजित होकर नेपाल की ओर चले गये पर वहीं से क्रान्तिकारियों को सहायता पहुँचाकर स्वतंत्रता संग्राम को निरंतरता प्रदान की। हज़रत महल के शौर्य और संगठन शक्ति की सराहना करते हुए ‘लन्दन टाइम्स’ के तत्कालीन संवाददाता सर डब्ल्यू रसेल ने बेग़म के बारे में लिखा, “वह महान शक्ति और योग्यता वाली स्त्री थी। …. बेग़म ने हमारे विरुद्ध कभी न खत्म होने वाले युद्ध की घोषणा की है।” प्रस्तुत औपन्यासिक कृति में लेखक ने इसी तेजस्वी और यशस्वी बेगम हजरत महल को केन्द्रीय पात्र के रूप में रचा है। ऐतिहासिक तथ्यों और घटनाओं को लेखक ने अपनी भाषा के बल पर ऐसी रचनात्मक कृति के रूप में प्रस्तुत किया है कि पाठक इस उपन्यास को पढ़ते समय रोमांचित, पुलकित, देशप्रेम के जज्बे से आलोकित और बेग़म की चारित्रिक दृढ़ता के प्रति श्रद्धावनत हो उठता है। गजब की पठनीयता से युक्त यह कृति भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम पृष्ठों को हमारे समक्ष खोलती है।
| ISBN-13 | 9788170564300 |
|---|---|
| Author | Surendra Kant |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2008 |
| Pages | 152 |
| Year | 2008 |
| Subject | Literature & Fiction |
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