Ghar Apana-Apana
Shashibhushan Singhal · Panchsheel Prakashan
Ghar Apana-Apana शशिभूषण सिंघल का उपन्यास ‘घर अपना-अपना’ भारतीय घरों की पहचान और उनकी पारिवारिकता को दर्शाता है, जो टूट-फूट के बाद भी बनी हुई है। यह कृति गिरीश बाबू के बेटे राजीव के ऑस्ट्रेलिया जाने, बेटी सुलक्षणा के आत्मनिर्भर बनने, और अशोक के माता-पिता के साथ रहने जैसे विविध पारिवारिक रूपों को रोच
भारतीय घरों की पहचान है, उनकी पारिवारिकता। टूट-फूट के बाद भी यह बनी हुई है। इसे बनाये रखने के लिए व्यक्ति को भी अपने भीतर झाँकना होगा। जीवन कहाँ से आता है। शायद उत्साहपूर्वक अपनों के बीच जीने में। अपने कौन, जिन्हें अपना मान लिया। अपनेपन का जरा-सा लेन-देन कितनी ऊर्जा दे जाता है। दूसरों से सुख-दुःख के कुछ क्षण बाँट पाना विरलों को ही नसीब हो पाता है। उपन्यास में घर के विविध रूप हैं-गिरीश बाबू का बेटा राजीव, उन्हें उनके हाल पर छोड़कर, अपना जीवन बनाने ऑस्ट्रेलिया चला जाता है। बेटी सुलक्षणा माता-पिता पर भार न बनकर, अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है। दूसरे घर में, अशोक का बड़ा भाई अमेरिका जा बसा है और अपनों को भुला बैठा है। अशोक स्वयं ऐसा नहीं बन पाता। वह कुछ कम पर संतुष्ट रहकर, माता-पिता के साथ रहना पसन्द करता है। अमेरिका में डॉ. दर्शन राव का परिवार है। संतुष्ट होने के बावजूद भारत उनसे छुड़ाये नहीं छूटता। डॉ. विशाल घर बसाकर अन्ततः अमेरिकन पत्नी से अलग हो जाते हैं। भारत आकर यहाँ भी टिक नहीं पाते। घर के, न घाट के। जिनकी सन्तान नहीं, वे दुःखी, और जिनकी है, वे भी दुःखी। आखिर, चाहिए क्या ! आदमी, आदमी से जुड़े। जुड़ने के लिए, भीतर से कुछ चाहिए। भीतर, बाहर एक करना होगा। इसी कशमकश में, घर के बिखरते-सँवरते विविध रूपों को, यह उपन्यास अपनी रोचक शैली में कहता-दिखाता चलता है। कथायें अलग-अलग दीखती हैं, किन्तु उनका सार, इनके भीतरी तारतम्य में है।
| ISBN-13 | 9788170565444 |
|---|---|
| Author | Shashibhushan Singhal |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2011 |
| Pages | 120 |
| Year | 2011 |
| Subject | Literature & Fiction |
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