Kala Sach (Aitihasik Upanyasa)
Manmohan Sehgal · Panchsheel Prakashan
Kala Sach (Aitihasik Upanyasa) मनमोहन सहगल का ऐतिहासिक उपन्यास ‘काला सच’ पाटण-नरेश करणादेव और उनके दुर्भाग्यशाली परिवार की मार्मिक नियति को दर्शाता है। यह कृति मानवीय दर्द, अंधे सांप्रदायिक अत्याचारों और कर्म-चक्र के प्रभावों को संवेदनशीलता से चित्रित करती है, जहाँ पिता के कर्मों का फल पुत्री को भी
कहते हैं, कल्पना इतिहास से अधिक सच्ची और इतिहास कल्पना से अधिक सहज और मार्मिक होता है और इसी तब्य को हमने पाटण-नरेश करणादेव तथा उनके दुर्भाग्यशाली परिवार की नियति में साकार हुआ देखा है। सच तो सच ही होता है, किन्तु यदि सच की कहानी मानवी दर्द और अंधे साम्प्रदायिक अत्याचारों से जुड़ी हो, तो अधिक संवेदनशील और हृदय स्पर्शी हो जाती है। प्रस्तुत सत्य-कथा का जन्म तो ऐतिहासिक रोमान से हुआ था, किन्तु दैवात् रोमान में जब पाशविकता मिल गई, तो सुन्दरता की साकार प्रतिमा देवलदेवी के लिए कभी न थमने वाला अवसाद और शारीरिक शोषण की शर्मनाक कहानी बन गई। यह ऐतिहासिक अभिशाप की ऐसी कथा है, जो नैतिकता के स्तर पर विश्व को ‘जैसी करती, वैसी भरनी’ का संदेश देती है। पिता के कर्मों का फल पुत्री को नहीं मिलता, फिर भी जनक जननी की मूर्खताओं से पुत्री का प्रभावित होना क्या सहज नहीं? अभिप्राय यह कि कर्म चक्र निश्चय ही व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं होता। कर्म के दायरे में माता-पिता, घर-परिवार के कृत्य और गतिविधियाँ, सभी शामिल होती होंगी। अतः मात्र अपने ही कर्मों को उत्तम बनाकर हमें उत्तम जीवन जीने की आशा नहीं करनी होगी। एक सामाजिक घटक होने के नाते अपने कर्मों का दायित्व ओढ़ने के साथ-साथ अपने घर के अन्य लोगों का दायित्व भी संभालना अपेक्षित होता है-यहाँ ‘काला सच’ का संदेश है। नियति से जूझने के लिए सत्कर्म करो, जिनके बीच रहो उन्हें भी सत्कर्म की प्रेरणा दो। अपने स्वार्थ की रक्षा में दूसरे के लिए गड्ढ़ा खोदना हमारे अपने गिरने की सम्भावना की जन्म देता है। यह ‘सत्य’ है और क्योंकि नियति के स्तर पर यह सत्य पीड़ा और विपत्ति का आकलन करता है, इसलिए’ काला’ है।
| ISBN-13 | 9788170563600 |
|---|---|
| Author | Manmohan Sehgal |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2006 |
| Pages | 164 |
| Year | 2006 |
| Subject | Literature & Fiction |
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