Ishopanishad
Arjun Dev Arya 'Visham' · Panchsheel Prakashan
Ishopanishad सच्चिदानंद ब्रह्म ने मनुष्य योनि को सत्य और चित्त (चेतन्य) का ज्ञान प्रदान किया है। अर्जुन देव आर्य ‘विषम’ द्वारा लिखित यह ईशोपनिषद् यजुर्वेद का अंतिम अध्याय है, जो मन-इंद्रियों और प्राणों का संचालक परमेश्वर ‘ओउम्’ के स्वरूप का निरूपण करती है। इसका अध्ययन-चिंतन-मनन पाठक के मन-मस्तिष्क स
सच्चिदानन्द ब्रह्म ने मनुष्य योनि को ही अपने दो गुण अर्थात् सत्य और चित्त अर्थात् चेतन्य : अच्छे-बुरे, करणीय-अकरणीय का ज्ञान प्रदान किया है। शेष समस्त योनियों को मात्र सत्य, शारीरिक सत्ता ही प्रदान की है। यों आहार-निद्रा और भय सम्बन्धी ज्ञान तो प्रत्येक योनि को प्रदान की है, परन्तु अच्छा-बुरा, करणीय-अकरणीय का ज्ञान मात्र मनुष्य योनि को ही प्रदान किया है। इसके होते हुए भी चूंकि वह अल्पज्ञ है, अतः इस विवेक को ईश्वर प्राप्ति और आनन्द प्राप्ति में न लगा स्वार्थ-सिद्धि में ही इसका प्रयोग किया करता है। वस्तुतः मानव मन अत्यन्त चंचल है, कभी स्थिर रहता ही नहीं है, सदा सांसारिक वृत्तियों में दौड़ाता ही रहता है। इसी हेतु परमेश्वर ने ज्ञानकाण्ड (ऋग्वेद) के पश्चात् कर्मकाण्ड (यजुर्वेद) का उपदेश दिया। यजुर्वेद में चालीस अध्याय हैं, प्रथम उनचालीस अध्यायों की शिखा कर्म के अनुष्ठान से अन्तःकरण को शुद्ध करने वाली है। इसके अध्ययन-चिन्तन-मनन आदि के द्वारा शम-दम, काम-क्रोध, मद, लोभ, मोह की शान्ति कर मन को नियन्त्रित कर तितिक्षा अर्थात् सहन-शक्ति को पूर्ण विकसित करके वासनाओं से मुक्त हाती है। अन्त में ब्रह्म-ज्ञान की इच्छा से युक्त मुमुक्षु पुरुष के लिए यह यजुर्वेद का अन्तिम अर्थात् चालीसवां अध्याय पूर्ण रूप में (17+1) ईशोपनिषद् व ईशावास्योपनिषद् वा वाजसनेयोपनिषद् नामों से लिखी गई है। उसी को मूल यजुर्वेद की संहिता के अन्तर्गत भी कहा/माना गया है।
| ISBN-13 | 9788170564393 |
|---|---|
| Author | Arjun Dev Arya 'Visham' |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2008 |
| Pages | 124 |
| Year | 2008 |
| Subject | Spirituality & Philosophy |
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