Sanskriti Samwad
Shivcharan Kaushik · Panchsheel Prakashan
Sanskriti Samwad संस्कृति से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों पर एक रचनात्मक संवाद, जो भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव और मानव संस्कृति को समग्रता में देखने का प्रयास करता है। यह कृति दर्शाती है कि संस्कृतियों की परस्पर आवाजाही उन्हें समृद्ध करती है, और शाश्वत मानवीय मूल्यों से निर्मित मानव संस्कृति
प्रस्तुत कृति संस्कृति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर किया गया एक लम्बा संत्राद है। डॉ. शिवशरण कौशिक ने डॉ. हेतु भारद्वाज के समक्ष समाज, संस्कृति, शिक्षा आदि से जुड़े मुद्दों को रखा है जिन पर हेतु भारद्वाज ने अपने स्पष्ट विचार प्रस्तुत किए हैं। संस्कृति का मुद्दा कई दृष्टियों से विवादास्पद रहा है। भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव को लेकर विद्वानों में मत-वैभिन्य रहा है। किन्तु यह कृति इन प्रश्नों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करती है तथा मानव संस्कृति को समग्रता में देखने का प्रयास करती है। एक संस्कृति दूसरी संस्कृति को विरूपित नहीं करती बल्कि उसे समृद्ध करती है। संस्कृतियों की परस्पर आवाजाही अनन्तकाल से रही है तथा मनुष्य ने, चाहे वह किसी भी देश का हो, उन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा की है जो मनुष्यता की रक्षा करते रहे हैं और मनुष्य की बेहतरी की चिन्ता करते रहे हैं। यह कृति मानव संस्कृति के मूल स्वरूप को रेखांकित करती है और संस्कृति कर्मियों को सोचने पर विवश करती है। आदिम काल से ही संस्कृति के विकास की प्रक्रिया अनवरत रूप से चलती रही है। हर युग में मनुष्य ने आत्म-परिष्कार द्वारा अपनी सांस्कृतिक भूमि को उर्वर बनाया है। यह उर्वरता मानव जीवन को नये-नये आयाम देती रही है। इसी प्रवाह में संस्कृति का एक बहुआयामी स्वरूप विकसित होता रहा है। निश्चय ही हर देश की जीवन-शैली अपनी होती है, जो वहाँ की संस्कृति को आकार देती है। किन्तु अपनी आधारभूत प्रकृति में मानव-संस्कृति की निर्मिति शाश्वत मानवीय मूल्यों से होती है। अतः मानव संस्कृति का मूल स्वरूप मानवीय मूल्यों से जुड़ा होता है। यह रचनात्मक संवाद यह भी रेखांकित करता है कि संस्कृति की अवधारणा न एक रेखीय है न एक आयामी। मनुष्य का सारा जीवन संस्कृति के उन तत्त्वों से बुना हुआ है जो उसे जीवन संघर्षों में जीने की दिशा और सामर्थ्य प्रदान करते हैं। वस्तुतः मानव संस्कृति मानव जीवन का पर्याय है तथा संस्कृति के बिना मानव जीवन के स्पंदन की कामना नहीं की जा सकती।
| ISBN-13 | 9788170566137 |
|---|---|
| Author | Shivcharan Kaushik |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2015 |
| Pages | 120 |
| Year | 2015 |
| Subject | Indian Culture & History |
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