Meri Priya Vyang Rachnayen
Surybala · Panchsheel Prakashan
सूर्यबाला की व्यंग्य यात्रा उनकी कथा यात्रा के समानांतर चलती आई है, जिसमें विट, ह्यूमर और परिहासी आवरण के बीच से विद्रूप उपजता है। ‘मेरी श्रेष्ठ व्यंग रचनाएँ’ संग्रह में आक्रोश और करुणा दोनों है, जिसमें शिष्ट हास्य को व्यंग्य की नक्काशी माना गया है। यह कृति ‘यात्रा अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की’
प्रख्यात रचनाकार सूर्यबाला की व्यंग्य यात्रा उनकी कथा यात्रा के समांतर चलती आयी है। अतः समकालीन व्यंग्य-लेखन के परिदृश्य में भी वे एक व्यंग्यकार के रूप में अपने विशिष्ट अंदाज के साथ उपस्थित हैं। धर्मयुग के बैठे-ठाले स्तम्भ से अपने व्यंग्य- लेखन की शुरुआत करने वाली सूर्यबाला की व्यंग्य रचनाओं में विट, ह्यूमर और परिहासी आवरण के बीच से जो विद्रूप उपजता है उसमें जितनी करुणा और अवसाद है, उतनी ही बेधकता और आक्रोश भी। शिष्ट हास्य को सूर्यबाला व्यंग्य की नक्काशी मानती हैं जिससे रचनाशिल्प की बेहतर तराश तो होती ही है, उसे भोथरी प्रहारात्मकता से भी बचाती है। शायद इसीलिये उनका व्यंग्य न कहीं सपाट होता है, न सतही बल्कि अपनी मासूमियत में लाजबाव होता है और प्रभाव में असरदार। बानगी के तौर पर उनकी व्यंग्य रचना ‘यात्रा अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की’ प्रस्तुत पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-“वैसे भी हिन्दी लेखक आजकल साहित्य में पैदा बाद में होते हैं, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में पहले हो आते हैं।” * * * पिता ने पुत्र को बुलाकर आदेश दिया- “अपनी माँ के लिये हिन्दी सम्मेलन तक का टिकट ला दो। सुना है अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के टिकट इन दिनों ब्लैक में बिक रहे हैं।” * * * “हिम्मत से काम लीजिये और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन तक हो आइए। आपके इस तरह दहाड़े मार कर रोने से हिन्दी का कोई भला नहीं होने वाला। आप वही कर रही हैं जो पिछले पचपन वर्षों से हिन्दी वाले कर रहे हैं।”
| ISBN-13 | 9788170565543 |
|---|---|
| Author | Surybala |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2011 |
| Pages | 160 |
| Year | 2011 |
| Subject | Literature & Fiction |
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