Baadab Bemulajha
Shankar Punatambekar · Panchsheel Prakashan
बाअदब बेमुलाहजा’ की व्यंग्य रचनाएँ शिष्टतापूर्ण हैं सो बाअदब, बेलौस हैं सो बेमुलाहजा। सच कहें तो इस शीर्षक में व्यंग्य का स्वरूप ही विद्यमान है। यहाँ व्यग्य किसी को नहीं बख्शता, साथ ही यों ही खींचतानकर भी वह उपस्थित होता। रचनाओं में व्यापक वर्तमान युग परिलक्षित है, तथापि फिंक जाने वाला सामयिक व्यंग्
बाअदब बेमुलाहजा’ की व्यंग्य रचनाएँ शिष्टतापूर्ण हैं सो बाअदब, बेलौस हैं सो बेमुलाहजा। सच कहें तो इस शीर्षक में व्यंग्य का स्वरूप ही विद्यमान है। यहाँ व्यग्य किसी को नहीं बख्शता, साथ ही यों ही खींचतानकर भी वह उपस्थित होता। रचनाओं में व्यापक वर्तमान युग परिलक्षित है, तथापि फिंक जाने वाला सामयिक व्यंग्य यहाँ नहीं है। इसमें युगीय यथार्थ ज्यों-का-त्यों नहीं है, वे यथार्थ में निहित प्रवृत्तियों में से निर्मित हैं। यहाँ व्यंग्य ऐसा अंतर्मुखी दर्शन है जो निषेधात्मक होते हुए भी जीवन से गहरे जुड़ा है तथा वह जीवन के लिए धारदार सोच को भी उकसाता है। कहीं सार्थक व्यंग्य है। करीब-करीब समान आकार की इन रचनाओं की अन्य विशेषता यह है कि इनका एक-एक शब्द ‘जड़िया’ है और अपनी सामासिकता में ये दूरान्वयी संदर्भों से जुड़ी हैं। सुधी पाठक इसमें अवश्य ही एक अलग किस्म की वैचारिक रसात्मकता पायेगा
| ISBN-13 | 9788170562467 |
|---|---|
| Author | Shankar Punatambekar |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Pages | 280 |
| Year | 2002 |
| Subject | Literature & Fiction |
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