Sanvidhan Shankaye Aur Sambhavnaye
Rajendra Shankar Bhatt · Panchsheel Prakashan
श्री भट्ट जी ने संविधान के हर पहलू पर अत्यन्त गूढ़ अध्ययन करने के पश्चात् एक विहंगम दृष्टि डाली है तथा पाठकों को संविधान की रचना से अन्तिम संशोधन तक समझाने के लिए प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं मनीषियों द्वारा लिखित स्मृतियों का विवेचन करते हुए तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हवाला देते हुए पूरे भारतीय इतिहा
श्री भट्ट जी ने संविधान के हर पहलू पर अत्यन्त गूढ़ अध्ययन करने के पश्चात् एक विहंगम दृष्टि डाली है तथा पाठकों को संविधान की रचना से अन्तिम संशोधन तक समझाने के लिए प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं मनीषियों द्वारा लिखित स्मृतियों का विवेचन करते हुए तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हवाला देते हुए पूरे भारतीय इतिहास के साथ-साथ आज के हालात का जायजा भी लेने की सामग्री जुटाई है। श्री राजेन्द्र शंकर जी भट्ट एक कुशल प्रशासक, चिन्तक, साहित्यिक, निर्भीक पत्रकार एवं सशक्त लेखनी के धनी रहे हैं, अतः उन्होंने अपने लेखों में कलम का सटीक उपयोग किया है। गांधी दर्शन को जीने वाले एवं स्वतन्त्रात संग्राम में विद्यार्थी जीवन से जुड़े रहे श्री भट्टजी ने अधिकारपूर्वक अपनी बातों को स्पष्ट शब्दों में कहा है। श्री भट्ट जी ने संसद, सांसद एवं संसदीय प्रणाली एवं उनकी कार्यशैली पर जो लेख लिखे हैं वह इतने अच्छे हैं कि मैं समझता हूँ कि समस्त सांसदों एवं विधायकों को बाध्य किया जाये कि वे इस पुस्तक का अध्ययन करें तथा उसके पश्चात् आत्मचिन्तन आत्मलोचन तथा आत्मविश्लेषण करें और प्रेरित हों, “भारत के लोगों” के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाने को। मुझे पूर्ण आशा है कि पुस्तक के प्रकाशित होने के पश्चात् अधिक-से-अधिक पाठक हर वर्ग के, हर तबके के, और हर क्षेत्र के इसे पढ़ेंगे तथा आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित होंगे तथा देश के भविष्य को प्रशस्त करने में अपना योगदान देंगे- यही इस पुस्तक की सार्थकता होगी, जिसमें मुझे कोई शंका नहीं है।
| ISBN-13 | 9788170562160 |
|---|---|
| Author | Rajendra Shankar Bhatt |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | Third, 2007 |
| Pages | 232 |
| Year | 2000 |
| Subject | Politics & Governance |
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