Mile Sur Mera Tumhara
Manmohan Sehgal · Panchsheel Prakashan
Mile Sur Mera Tumhara मनमोहन सहगल का उपन्यास ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ आँचलिकता की गंध में लिपटी वर्तमान समाज की संकीर्णताओं का यथार्थ दस्तावेज है। यह पंजाब में प्रवासी मजदूरों के आयात, नशे की लत, कन्या भ्रूण हत्या, और आतंकी साया जैसे ज्वलंत मुद्दों को उजागर करता है, साथ ही पंजाबियों की उदारता, परिश्
प्रस्तुत उपन्यास ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ आँचलिकता की गंध में लिपटा वर्तमान समाज की संकीर्णताओं का यथार्थ दस्तावेज है। पंजाब में प्रवासी मजदूरों के आयात और पंजाबी युवाओं के विदेश-निर्यात की अनोखी टकराहट इसकी पृष्ठभूमि बनाते हैं। युवा पीढ़ी में नशे की लत और उससे उभरते उपराध को चित्रित करते हुए लेखक ने ऐसी सच्चाइयों को उघाड़ा है, जो विगत वर्षों में जोंक की तरह पंजाबी रक्त का पान कर रही हैं। फिर भले ही वह युवतियों में एन.आर.आई. दूल्हों की ललक हो, कन्या भ्रूण हत्या का प्रचलन हो, समाज पर मंडराता आतंकी साया हो या खेत की मिट्टी के साथ प्यार करने में युवा पीढ़ी की शिथिलता हो लेखक सभी क्षेत्रों में झांक आया है। जब कोई समाज आलस्य और नशाखोरी का शिकार होता है, तो सहज ही उसे पराश्रित होना पड़ता है। पंजाब में जब ऐसी परिस्थितियों का उदय हुआ, तो उसकी उदारता और सबको अपना बना लेने की शक्ति ने मिलकर ‘मेरे-तुम्हारे सुरों को हमारी धुन’ में बदला। इसीलिए आज पंजाब एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहाँ प्रान्तीयता और भाषायी संकीर्णताओं का कोई स्थान नहीं। परिश्रम से कमाने-खाने वालों के लिए इस धरती पर कभी विरोध की आवाज नहीं उठी। यहाँ प्यार की धुन का महत्त्व सर्वोपरि है। पंजाब के पर्वोत्सवों और रीति-रिवाजों की मधुरता के कारण आँचलिकता इस उपन्यास का एक अनूठा पहलू है। पंजाबियों की उदारता, परिश्रम, सम-भाव, सम्बन्धों की मिठास और संघर्षशील मनोवृत्ति जीवन के लिए एक नयी राह प्रशस्त करती है, जिसमें संगीत की अलग-अलग धुनें मिलकर एक समाँ बांधा करती हैं। पर्वोत्सवों को एक-साथ मिलकर मनाने की अद्वितीय शैली और विवाह-शादियों में हास्य-विनोद एवं संस्कारजन्य गीतों के समावेश से समारोहों की शोभा कई गुणा बढ़ जाती है-इस ओर पाठक को आकृष्ट करना उपन्यासकार का विशिष्ट लक्ष्य हो सकता है। सबसे ऊपर उपन्यास का विराट संदेश है-‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, सुर बने हमारा’। यदि एक देश के विभिन्न खण्डों- जनपदों में रहने वाले सब अपनी संकीर्ण सोच का त्याग कर नारी-सशक्तिकरण की प्रायोगिकता को स्वीकार करते हुए एक-दूसरे के हित की सोचने और सर्वमंगला वृत्ति का आचरण करने लगें, तो उससे देश का असीम कल्याण होगा।
| ISBN-13 | 9788170564812 |
|---|---|
| Author | Manmohan Sehgal |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | First, 2009 |
| Pages | 216 |
| Year | 2009 |
| Subject | Literature & Fiction |
Related books
- Endless Song Tiruvaymoli
- A Treasury Of Indian Wisdom
- The Minority Conundrum :Living In Majoritarian Times
- The Book Of Man: The Book Of Woman
- And Perhaps Love
- The Fakir :The Journey Within
- An Extraordinary Life :A Biography Of Manohar Parrikar
- A Talib'S Tale :The Life And Times Of A Pashtoon Englishman
India's trusted online book store