Saltantakalin Itihaskar Evam Itihas-Lekhan

Saltantakalin Itihaskar Evam Itihas-Lekhan

Dr. Ashok Kumar Singh · Panchsheel Prakashan

Hindi · Paperback · Edition: First, 2008

₹315 ₹350 10% off

Saltantakalin Itihaskar Evam Itihas-Lekhan भारतीय वाङ्मय में इस्लाम की सबसे बड़ी देन इतिहास-लेखन के रूप में है। डॉ.

भारतीय वाङ्मय में इस्लाम की सबसे बड़ी देन इतिहास-लेखन के रूप में है। इस्लाम के अनुयायियों की इतिहास में अभिरुचि इस्लाम धर्म के प्रादुर्भाव से ही रही है। प्रारम्भिक अरब इतिहासकारों ने पैगम्बर मुहम्मद एवं खलीफाओं पर अनेक ऐतिहासिक ग्रन्थों की रचना की है। इसके आगे इन इतिहासकारों ने इस्लाम की विजयों, राष्ट्रों तथा युगों का इतिहास लिखा है। इसे अरबी इतिहास-लेखन की परम्परा कही जाती है। कालान्तर में इस इतिहास-लेखन पर फारसी पुनर्जागरण का प्रभाव पड़ा और अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने अरबी भाषा के स्थान पर फारसी भाषा को अपने लेखन का माध्यम चुना। राज्याश्रय प्राप्ति के लिये समुत्सुक इन इतिहासकारों ने ‘राष्ट्रों तथा युगों’ के स्थान पर ‘शासकों एवं वंशों’ का इतिहास लिखना प्रारम्भ कर दिया। इतिहास-लेखन की इस परम्परा को फारसी इतिहास-लेखन कहा जाता है। तुर्की सत्ता की स्थापना के उपरान्त दिल्ली सल्तनत के इतिहासकारों ने भारत में भी इतिहास- लेखन आरम्भ किया। निःसन्देह यह इतिहास- लेखन फारसी इतिहास लेखन की परम्परा से ही अधिक प्रभावित था। फलस्वरूप मध्यकालीन भारतीय इतिहास-लेखन भी फारसी इतिहास- लेखन के दोषों से मुक्त नहीं हो सका। प्रस्तुत ग्रन्थ में सल्तनतकालीन इतिहास लेखकों में हसन निजामी, मिनहाज सिराज, अमीर खुसरो, एसामी, इब्ने बत्तूता, जियाउद्दीन बरनी, सीरत-ए-फीरोजशाही का अज्ञात लेखक, फीरोजशाह तुगलक, शम्स सिराज अफीफ एवं यहिया की कृतियों की विवेचना की गई है। परिशिष्ट में मुहम्मद बिन तुगलक की तथाकथित आत्मकथा की समालोचना की गई है। ‘सल्तनत कालीन इतिहास-लेखन: एक सर्वेक्षण’ शीर्षक से लिखे अध्याय में इस काल के इतिहास-लेखन के गुण-दोषों की चर्चा की गई है।

ISBN-139788170564362
AuthorDr. Ashok Kumar Singh
PublisherPanchsheel Prakashan
LanguageHindi
BindingPaperback
EditionFirst, 2008
Pages200
Year2008
SubjectHistory

Category: Textbooks & Study Guides

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