Sanjh Ho Gayi
Tejpal Chaudhary · Panchsheel Prakashan
Sanjh Ho Gayi तेजपाल चौधरी का उपन्यास ‘सांझ हो गई’ मानव सेवा के मूल मंत्र ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ पर आधारित एक प्रयोग है। यह कृति ‘स्व’ के विस्तार की कथा है, जो व्यक्तिगत प्यार से अहंकार की बजाय मानव मात्र से प्रेम की ओर ले जाती है, जिससे सेवा सहज वृत्ति बन जाती है। यह बुजुर्ग पीढ़ी की पीड़ा और वर्तमान
सांझ हो गयी’ उपन्यास एक प्रयोग है। दूसरे शब्दों में प्रवाह के विरुद्ध तैरने का एक साहसिक प्रयास ! उपन्यास का केन्द्रीय स्वर मानव सेवा से जुड़ा है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सेवा का मूल मन्त्र है। प्यार के बिना सेवा का कोई मूल्य नहीं होता। यद्यपि व्यक्तिगत प्यार अहंकार पैदा करता है, किन्तु जब हम मानव मात्र से प्यार करते हैं तो हमारा ‘स्व’ विगलित हो जाता है और उसका विस्तार हो जाता है। इस स्थिति में सेवा हमारी सहज वृत्ति बन जाती है। यह उपन्यास ‘स्व’ के इसी विस्तार की कथा है। उपन्यास में यथासन्दर्भ बुजुर्ग पीढ़ी की पीड़ा भी मुखरित हुई है, जो वर्तमान युग की सबसे ज्वलन्त समस्या है। ‘सांझ हो गयी’ कृति आपको नयी दिशा में सोचने को विवश करेगी, साथ ही पाठक को रागात्मक स्तर पर जीवन मूल्यों के प्रति जागरूक करेगी। ‘सांझ हो गयी’ कृति वर्तमान जीवन में बढ़ रही विसंगतियों के बीच पाठक को नया आस्वाद देगी।
| ISBN-13 | 9788170565338 |
|---|---|
| Author | Tejpal Chaudhary |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | Second, 2014 |
| Pages | 256 |
| Year | 2010 |
| Subject | Literature & Fiction |
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