Aadhunik Bharat Ka Itihas (1858-1919)
Shivkumar Gupt · Panchsheel Prakashan
1858 के बाद के भारत का परिदृश्य पिछली शताब्दी से सर्वथा भिन्न था। इस युग का केन्द्रीय विषय भारतीय बौद्धिक मन पर पाश्चात्य प्रभाव है। 1857 के पूर्व ही भारत में एक राष्ट्रीय चेतना का जन्म हो चुका था जो एक लम्बी प्रक्रिया का परिणाम थी। अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भारतीय विचारों में जो क्रान्तिकारी परि
1858 के बाद के भारत का परिदृश्य पिछली शताब्दी से सर्वथा भिन्न था। इस युग का केन्द्रीय विषय भारतीय बौद्धिक मन पर पाश्चात्य प्रभाव है। 1857 के पूर्व ही भारत में एक राष्ट्रीय चेतना का जन्म हो चुका था जो एक लम्बी प्रक्रिया का परिणाम थी। अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भारतीय विचारों में जो क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ था उसी के द्वारा भारतीयों ने पश्चिम के साहित्य, इतिहास, राजनीति, कानून, दर्शन और विज्ञान आदि का अध्ययन किया और शेक्सपीयर, मिल्टन, मिल, मैकाले, स्पेन्सर और रूसों के विचारों से परिचित हुए। पिछली एक शताब्दी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शोषण से समाज में अंग्रेजी शासन के विरोध में एक ज्वालामुखी जन्म ले रहा था जिसका विस्फोट 1857 की क्रान्ति के रूप में हुआ। इस क्रान्ति से स्वतन्त्रता भले ही प्राप्त न हुई हो परन्तु इसने अंग्रेजों और भारतीयों दोनों को अपनी-अपनी स्थिति पर विचार करने के लिए विवश अवश्य किया। अंग्रेजों ने यह अनुभव किया कि भारतीयों के सहयोग के बिना अब लम्बे समय तक शासन करना सम्भव नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय असन्तोष को संगठित रूप में प्रगट करने का अवसर दिया। 1920 तक कांग्रेस का आन्तरिक इतिहास वैचारिक उथल-पुथल का है। इस संस्था को दो विचारधाराओं के लोगों ने आन्दोलित किया- उदारवादी और उग्रवादी। यद्यपि दोनों वर्गों के लोग बुद्धिवादी मध्यम वर्ग से आए थे लेकिन दोनों का ध्येय एक होते हुए भी कार्यपद्धति और सोच पृथक् पृथक् थी। उदारवादी वर्ग, जिसने कांग्रेस की स्थापना की थी, पाश्चात्य संस्कृति, अंग्रेजी-न्याय, नैतिकता और उनके संविधान से प्रभावित था। इस वर्ग का विश्वास था कि धीरे-धीरे संवैधानिक तरीकों से राज्य का अधिकार प्राप्त किया जा सकता है। रानाड़े के अनुसार राजनीतिक सौदेबाजी ‘क्या सम्भव है’ की सीमा के भीतर ही की जा सकती है। अन्ततः वे ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही ‘स्वराज्य’ की कामना करते थे। उग्रवादी इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे। वे भारत का निर्माण स्वयं करना चाहते थे। 1916 में उग्रवादियों ने कांग्रेस पर अधिकार करके उपनिवेशिक स्वायत्त शासन के स्थान पर, स्वराज्य की स्थापना पर बल दिया। व्यक्तिवाद और उदारतावाद के स्थान पर उन्होंने प्राचीन समष्टिवाद की घोषणा की। पश्चिम की उदारतावादी राष्ट्रीयता का स्थान अब भारतीय राष्ट्रीयता ने ले लिया जिसे प्राय
| ISBN-13 | 9788170562061 |
|---|---|
| Author | Shivkumar Gupt |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | 2009 |
| Pages | 424 |
| Year | 1999 |
| Subject | History |
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