Aadhunik Bharat Ka Itihas (1756-1858 E.)
Shivkumar Gupt · Panchsheel Prakashan
मुगलों के पतन के पश्चात् एक शताब्दी का इतिहास तीन शक्तियों-मराठा, उत्तर मुगल और अंग्रेज के मध्य सत्ता संघर्ष का इतिहास है। अट्ठारहवीं शताब्दी में अब्दाली के आक्रमण और मुगल अमीरों और सामन्तों के पारस्परिक झगड़ों के कारण मुगल साम्राज्य का अखिल भारतीय स्वरूप समाप्त हो गया। वह केवल दिल्ली का राज्य मात्र
मुगलों के पतन के पश्चात् एक शताब्दी का इतिहास तीन शक्तियों-मराठा, उत्तर मुगल और अंग्रेज के मध्य सत्ता संघर्ष का इतिहास है। अट्ठारहवीं शताब्दी में अब्दाली के आक्रमण और मुगल अमीरों और सामन्तों के पारस्परिक झगड़ों के कारण मुगल साम्राज्य का अखिल भारतीय स्वरूप समाप्त हो गया। वह केवल दिल्ली का राज्य मात्र रह गया। महान मुगलों के वंशज अब भारतीय साम्राज्य के लिए संघर्ष में स्वयं भाग नहीं लेते थे बल्कि सत्ता के दावेदार उनके नाम से संघर्ष करते थे। इसलिए नाम मात्र के लिए मुगलवंश दिल्ली के सिंहासन पर बहुत वर्षों तक बना रहा। यद्यपि आलमशाह जैसे बादशाहों ने अन्तिम बार अंग्रेजों से युद्ध करके दिल्ली की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न किया परन्तु असफल रहा। इस समय दूसरी शक्ति मराठों की थी। पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों की भारी क्षति होने के बाद भी उन्होंने आगामी तीन दशकों में ही अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर लिया। यह कार्य महादजी सिन्धिया के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। 1768- 71 के मध्य दिल्ली पर अधिकार करके उन्होंने शाहआलम को पुनः गद्दी पर बैठाया। इसी समय से मराठों का पुनरुत्थान प्रारम्भ हुआ। अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्तिम चालीस वर्षों में नाना फड़नवीस और महादजी सिन्धियाँ के नेतृत्व में मराठे अत्यन्त प्रभावी हो सकते थे परन्तु नाना के अविश्वास ने ऐसा होने नहीं दिया। फिर भी महादजी सिन्धियाँ ने निजाम, हैदरअली और मुदोजी भौंसले को मिलाकर एक अंग्रेज विरोधी गुट का निर्माण किया जिसने अंग्रेजों के सामने चुनौति खड़ी कर दी। इस संघर्ष में अंग्रेजों को भारत में पहली बार बड़े स्तर पर युद्ध लड़ना पड़ा। जिसका परिणाम साल्बाई की सन्धि के रूप में सामने आया। अपने सैनिक प्रभुत्व से उन्होंने मुगल साम्राज्य को नष्ट अवश्य कर दिया, परन्तु उसकी स्थानपूर्ति में असमर्थ रहे। तीसरी शक्ति के रूप में अन्ततोगत्वा ईस्ट इण्डिया कम्पनी सफल हुई। उसने क्लाइव के नेतृत्व में पहले बंगाल और फिर अवध पर अधिकार कर लिया। नौसैनिक शक्ति और सैनिक कुशलता इसकी सफलता के आधार थे। भारत में ब्रिटिश प्रशासन का प्रारम्भ प्लासी के युद्ध के परिणाम के रूप में माना जाता है। 1772 तक अंग्रेज एक महत्त्वपूर्ण भारतीय शक्ति बन गए थे। 1780 में वारेन हेस्टिंग अवश्य दक्षिण में मराठों से पराजित हुआ फिर भी अंग्रेजों ने भारत विज
| ISBN-13 | 9788170562085 |
|---|---|
| Author | Shivkumar Gupt |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | Reprint, 2009 |
| Pages | 345 |
| Year | 1999 |
| Subject | Indian Culture & History |
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