Prachin Bharat Ka Itihas (Prarambh Se 78 E.)

Prachin Bharat Ka Itihas (Prarambh Se 78 E.)

Shivkumar Gupt · Panchsheel Prakashan

Hindi · Paperback · Edition: Reprint, 2009

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इतिहासकारों के अथक् प्रयत्नों से प्राचीन भारत का राजनीतिक इतिहास, मूल स्त्रोतों के क्षीण होते हुए भी, अब स्थूल आकार-प्रकार में रेखांकित किया जा सकता है। हड़प्पा सभ्यता की अन्वेषण से वैदिक साहित्य के अर्थ पर नया प्रकाश पड़ा है। अभिलेखों ने कलियुग की पौराणिक वंशावलियों की सत्यता का समर्थन किया है। पौर

इतिहासकारों के अथक् प्रयत्नों से प्राचीन भारत का राजनीतिक इतिहास, मूल स्त्रोतों के क्षीण होते हुए भी, अब स्थूल आकार-प्रकार में रेखांकित किया जा सकता है। हड़प्पा सभ्यता की अन्वेषण से वैदिक साहित्य के अर्थ पर नया प्रकाश पड़ा है। अभिलेखों ने कलियुग की पौराणिक वंशावलियों की सत्यता का समर्थन किया है। पौराणिक इतिहास वैदिक साहित्य में वर्णित राजाओं के नामों से एक सीमा तक समर्थित होता है। पाज़िटर ने पौराणिक साहित्य की ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में उपयोगिता का युक्तिसंगत उपपादन किया है। मौर्यों से पहले के युग के राजनीतिक इतिहास का जो कुछ ढांचा मिलता है उसका मुख्य आधार पुराण ही हैं। इस पौराणिक विवरण में भी परीक्षित के पूर्व का इतिहास मानो कुहासे में ढंका हुआ है जिसमें कभी-कभी कुछ नाम या घटनाएं उभर आती हैं। छठी शताब्दी से बौद्ध, जैन और ब्राह्मण साहित्यों की तुलना से मौर्यों के पूर्व कुछ सदियों का इतिहास अब रेखांकित किया जा सकता है। मौर्यकाल से राजनीतिक इतिहास में सहायक के रूप में दो नए स्रोत गिने जाते हैं। एक तो यूनानी पर्यवेक्षक दूतों के विवरण और दूसरे अभिलिखित सामग्री। क्रमशः अभिलेखों का महत्त्व बढ़ता जाता है। यद्यपि प्राचीन भारतीय राजाओं के नाम, वंशावलियां और उनके द्वारा की गई कुछ उपलब्धियों का पता इन स्त्रोतों से चलता है तो भी 11वीं शताब्दी तक का भारतीय राजनीतिक इतिहास एक ऐसे चित्र की तरह से है जिसका अधिकांश मिट चुका है। प्राचीन भारत के इतिहासकारों को तिथि-निर्णय और स्थानों की पहिचान में ही अपनी विचार शक्ति का अधिकांश लगाना पड़ता है और कभी-कभी वे इन प्रश्नों पर निर्णायक सामग्री के अभाव में असमाधेय विवाद में भी पड़ जाते हैं, तो भी उनके प्रयत्नों से प्राचीन भारत के महान राजाओं, विजेताओं, प्रशासकों और संरक्षकों का जो पता चलता है वह भारत के राष्ट्रीय गौरव की भावना को प्राणवान बनाने के लिए समर्थ है। महापद्मनन्द और चन्द्रगुप्त के प्रताप की पुष्टि यवन इतिहासकारों के द्वारा होती है। अशोक और उसके अभिलेख विश्व इतिहास में अद्वितीय स्थान रखते हैं। पुष्यमित्र के राज्यकाल में वसुमित्र का यवनों को पराजित करना, खारवेल की अभिलिखित कीर्त्ति, मिलिन्द के प्रश्न, कनिष्क की विजयें और धर्म का समर्थन, गौतमीपुत्र रुद्रदामा की युद्ध और शान्ति में उपलब्धियां, समुद्रगुप्त की दिग्विजय, चन्द्रगुप्त की शक-

ISBN-139788170561910
AuthorShivkumar Gupt
PublisherPanchsheel Prakashan
LanguageHindi
BindingPaperback
EditionReprint, 2009
Pages430
Year1999
SubjectIndian Culture & History

Category: Textbooks & Study Guides

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