Poshan avam Posahar
Mangala Kango · Panchsheel Prakashan
हमारे शास्त्रों में मनुष्य के स्थूल शरीर के साथ एक सूक्ष्म शरीर की कल्पना की गयी है। स्थूल शरीर की रचना पाँच तत्त्वों से हुई मानी गई है तो सूक्ष्म शरीर की पाँच कोशों से। इनमें सबसे पहला अन्नमय कोश है। वह आधारभूत कोश है-प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा ज्ञानमय कोश उसके ही विस्तार हैं। इसीलिए
हमारे शास्त्रों में मनुष्य के स्थूल शरीर के साथ एक सूक्ष्म शरीर की कल्पना की गयी है। स्थूल शरीर की रचना पाँच तत्त्वों से हुई मानी गई है तो सूक्ष्म शरीर की पाँच कोशों से। इनमें सबसे पहला अन्नमय कोश है। वह आधारभूत कोश है-प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा ज्ञानमय कोश उसके ही विस्तार हैं। इसीलिए अन्न को ब्रह्म भी माना गया है। बिना अन्न के न स्थूल शरीर की अवस्थिति सम्भव है न सूक्ष्म शरीर का विकास। इस दृष्टि से हमारी सभी लौकिक एवं अलौकिक उपलब्धियों का सबसे प्रमुख कारक अन्न है अर्थात् आहार है। आहार ही हमारे जीवन की दिशा तय करता है- ‘जैसा खाये अन्न, वैसा रहे मन’ उक्ति इसी दिशा की ओर संकेत करती है। इसलिए हमारे शास्त्रों में एक ओर आहार की महत्ता को समझा गया तो दूसरी ओर आहार सम्बन्धी कतिपय नियम भी प्रतिपादित हुए। किन्तु यह भी सच है कि हम आहार के प्रति बहुत सजग नहीं रहे- रूखा-सूखा खाय के ठंडा पानी पी सूत्र अपनी जगह महत्त्वपूर्ण इसलिए था कि जिन्दगी बहुत सीधी सपाट थी, जबकि वर्तमान में मनुष्य की जिन्दगी बहुत व्यस्त बहुआयामी भी और जटिल हो गई है। एक ओर जीवन की जटिलताएँ दूसरी ओर नयी-नयी वैज्ञानिक शोधें-इसी दृष्टि से भी कि मनुष्य आहार के जरिये किस तरह सुखी रह सकता है। इसलिए शरीर विज्ञान के क्षेत्र में पोषाहार का अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में पल्लवित हुआ है जो मानव-स्वास्थ्य के संदर्भ में आहार के औचित्य, उसकी मात्रा, उसके तत्त्व आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण करती है। क्या खाना है? कब खाना है? कितना खाना है? क्यों खाना है? जैसे प्रश्न हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हो गये हैं। प्रस्तुत कृति इन सवालों का वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तर देती है तथा मनुष्य को अपने आहार के द्वारा स्वस्थ रहने के तरीकों का विश्लेषण करती है। यह कृति एक आम पाठक के लिए जितनी उपयोगी है उतनी ही एक विचार सम्पन्न पाठक के लिये क्योंकि यह कृति पाठक को उसके आहार तथा स्वास्थ्य के बारे में जागरूक रहने का प्रशिक्षण देती है। व्यावहारिक स्तर पर यह हमारे लिए एक जरूरी पुस्तक है।
| ISBN-13 | 9788170562443 |
|---|---|
| Author | Mangala Kango |
| Publisher | Panchsheel Prakashan |
| Language | Hindi |
| Binding | Paperback |
| Edition | Third, 2011 |
| Pages | 506 |
| Year | 2002 |
| Subject | Home Science |
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