Katyayansrotsutra Part-2

Katyayansrotsutra Part-2

Prof. Laxmiswar Jha · Chaukhambha Orientalia Delhi

Hindi · Hardcover

₹995

वेद समस्त ज्ञान-विज्ञान का उत्स है। वेदों में प्रतिपादित यज्ञ के वैज्ञानिक प्रयोग की विध श्रौतसूत्रों में वर्णित हैं। यजुर्वेद से सम्बन्धित मह में। कात्यायन प्रणीत श्रौतसूत्र बहु प्रचलित एवं प्रसिद्ध है। कात्यायन श्रौतसूत्र में कुल छब्बीस अध्याय हैं, जिनमें से सम्प्रति आदितः षष्ठ अध्याय तक ही हिन्दी टीका प्रकाशित हो रही है। इन छहः अध्यायों में प्रथम अध्याय में अधिकारि निरुपण एवं सामान्य परिभाषाएँ व्याख्यात हैं। द्वितीय एवं तृतीय अध्याय में दर्शपूर्णमास याग की विधि, चतुर्थ अध्याय में पिण्डपितृयाग एवं आग्रयणेष्टि का विधान, पंचम अध्याय में चातुर्मास्य का विधान तथा षष्ठ अध्याय में निरुढ पशुबन्ध का वर्णन किया गया है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का आधार है। अतः यज्ञों का साङ्गोपाङ्ग ज्ञान सर्वसाधारण के लिए आवश्यक है। द्रव्य-देवता या प्रकृति पुरुष या मैटर एजर्नी के संयोग से सम्पद्यमानयज्ञ विश्व की रचना करता है। होता, अध्वर्यु आदि ऋत्विजों की सहायता से यज्ञकर अग्निहोत्री जहाँ धर्म, अर्थ और काम की सम्प्राप्ति से लौकिक जीवन को सार्थक करता है, वहाँ यज्ञ के द्वारा स्वर्ग (मोक्ष) प्राप्त कर पुनः अपने मूलस्वरुप में अवस्थित हो जाता है। पाकयज्ञों की सहायता से कृषि. पशुपालन, व्यवसाय वृक्षारोपण, विद्यालय. देवालय, विश्रामालय, अनाथालय, औषधालय, सिंचाई, बाँध आदि के द्वारा तथा षोडशसंस्कार के द्वारा जीवन ही यज्ञ है।

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