ब्रह्मसूत्रम् :Brahamsutram - Maharishived Vyaspranit Set Of 3 Volume
Yativar Sri Bhole Baba, Pt. Gopinath Kaviraj, Prof. Umashankar Sharma 'Rishi', Dr. Kundan Kumar, Dr. Laxmikant Vimal · Chaukhambha Orientalia Delhi
प्रस्थानत्रयी में ब्रह्मसूत्र का विशिष्ट स्थान है। यह वेदान्त दर्शन का एक मूल ग्रन्थ है, जिसकी रचना महर्षि बादरायण व्यास ने की थी। यह उपनिषदों के दार्शनिक विचारों को सूत्ररूप में व्यवस्थित करता है। ब्रह्मसूत्र आत्मा, ब्रह्म और जगत् के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। ब्रह्मसूत्र पर सर्वप्रथम जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा और अद्वैत वेदान्त का प्रवर्तन किया। तदुपरान्त रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत वेदान्त की स्थापना करते हुए उस पर विशिष्ट भाष्य लिखा। पुनः माध्वाचार्य ने द्वैत वेदान्त का प्रतिपादन करते हुए भिन्न मत की व्याख्या की। इसके बाद निम्बार्काचार्य ने द्वैताद्वैत (भेदाभेद) एवं वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत वेदान्त का प्रतिपादन करते हुए ब्रह्मसूत्र की नई व्याख्या प्रस्तुत की। यह क्रम आज भी अनवरत जारी है। वर्तमान में ब्रह्मसूत्र की अनेक संस्कृत टीकाओं के होते हुए भी इसकी दुरुहता को देखते हुए यतिवर भोलेबाबा ने हिन्दी में अत्यन्त सरल व्याख्या प्रस्तुत की। यतिवर भोलेबाबा को ब्रह्मसूत्र पर हिन्दी भाषा में सर्वाधिक लोकप्रिय व्याख्याकार होने का गौरव प्राप्त है। भोलेबाबा की व्याख्या के अनेक संस्करणों के होने पर भी प्रस्तुत संस्करण शुद्धतम एवं नवीनतम है। ब्रह्मसूत्र के साररूप में महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज की विस्तृत भूमिका सभी अध्येताओं के लिए अवश्य पठनीय है। पुस्तक को आद्योपान्त पढ़कर महामहोपाध्याय प्रो. उमाशंकर शर्मा' ऋषि' ने अपनी शुभासंशा लिखकर पुस्तक की शोभा में अबिवृद्धि की है। सम्पूर्ण पुस्तक का प्रूफ संशोधन एवं सम्पादन का दायित्व डॉ. कुन्दन कुमार एवं डॉ. लक्ष्मीकान्त विमल ने धैर्यपूर्वक निर्वहन किया है। टंकणकर्जी श्रीमती मधु शर्मा ने धैर्यपूर्वक शुद्धतम टंकण किया है; अतः बधाई की पात्र हैं। आशा है कि पाठकगण पुस्तक को पढ़कर अवश्य प्रसन्न होंगे।
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